होली के रंग

श्रुचि सिंह

होली कहलाया रंगों का त्योहार,

याद रह गये चिप्स, पापड़, गुझिया और अबीर-गुलाल।

प्राकृतिक और केमिकल रंगों में उलझ गए, 

कई दिनों से आधे दिन में सिमट गए।

व्यस्तता में बाज़ार के पकवान पकड़ बना चुके,

घरों में पीढ़ियों पुराने व्यंजन कहीं छूट रहे।

बच्चे, बूढ़े, पड़ोसी सब महीना पहले जुट जाते थे, 

बातों में कब सबके पापड़-गुझिया बने पता न चल पाते थे।

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भागते-भगाते एक-दूसरे को रंगों में सराबोर करते हैं,

तेल-उबटन से रंगों की पकड़ कमज़ोर करते हैं। 

नाच-गाना, मौज टोलियों में हो रही,

ईख और चने की बाली इंतेज़ार कर रही।

अंधेरे में होलिका के साथ स्व-पाप का भी दहन कर लें,

दिन के उजियारे में अच्छाई, आशा और सज्जनता के रंग भर लें।

लाल रंग से जीवन में उत्साह, उमंग भर लें,

पीले से स्वास्थ्य भी सँवार लें।

हरे से समृद्धि और प्रकृति का आँचल थाम लें,

नीले से शांति और विश्वास बाँट लें।

केसरिया से शुचिता का वास करायें,

और गुलाबी से बालपन और निश्छलता जानें।

रंगों सा मेल-मिलाप सौंदर्य भरा हो,

जिसमें अपनी-अपनी पवित्रता का बल बड़ा हो।

अपनी-अपनी बुराइयों, कुकर्मों की क्षमा याचना कर लें,

जिनको दुखी किया उन्हें वापस अपना बना लें।

‘बुरा न मानो होली है’ का नारा सच कर दें,

क्षमा माँग लें, क्षमा कर दें, और पापों को नष्ट कर दें।

होली के रंगों में पवित्रता का रंग जोड़ लें,

‘बुरा न मानो होली है’ से बुराई नष्ट कर दें।

Dr. Shruchi Singh, Research Associate, Kuruom School of Advanced Sciences (An Indian subsidiary of ‘Institute of Advanced Sciences’)

रंगीले संदेश की संवाहक ‘होली’

डा. अपर्णा धीर

बचपन से ही होली मेरा favourite festival था।

कुछ दिन पहले से ही बाल्टी भर-भर के गुब्बारे फुलाने

और फिर उन गुब्बारों को किस पर मारे, इस पर मंत्रणा करना…..

जब कोई मिल जाए तो कौन निशाना लगाएगा, इस पर छत्तों से शोर मचाना… और फिर दबे पांव किसी एक का निशाना…. और बाकियों की हंसी-ठ्ठके की गूंज पूरी गली को मानो ‘जीवंत’ बना देती थी।‌

बड़े हुए तो पता लगा, होली तो खेला ही टोलियों में जाता है…….

एक टोली से दूसरी टोली- कितने रंगे, कितने भीगे, कितने बचे, कितने फंसे….. इस गणना में, क्या पता कितने किस टोली में घटे तो कितने किस टोली में बड़े। 

यह तो जब मुंह दुलता है, तब पता चलता है……

‘अरे! यह तो फलाने का लड़का है…इससे तो हमने पूरी उम्र बात न करने की कसम खाई थी, यह कैसे हमारी टोली में आ गया?’

फिर लगता है ‘अरे! अच्छा ही है जो हमारी टोली में आ गया, मस्ती तो……इसी ने हमें खूब कराई थी।’

यही तो ‘पागलपन’ होली की मस्ती कहलाती है,

जो अपने-पराये के भेद को विभिन्न रंगों में रंग कर…. एक नई तस्वीर बनाती है

रूप-रंग, अमीर-गरीब, काला-गोरा सब कुछ छुपाकर, ‘एकत्व’ भाव में लीन होना सिखाती है।

जन-जन को ‘एक’ करें,

पर उससे पहले…. सम्पूर्ण धरा को विभिन्न रंगों से रंगीन बनाती है।

कहते हैं ‘दीपावली-होली’ साल के सबसे बड़े त्यौहार हैं…..

एक में ‘दियों की लड़ी’ तो दूसरे में ‘रंगों की बौछार’ रहती है,
एक में ‘भगवान के आगमन’ की खुशी तो दूसरे में ‘भक्त की भक्ति’ की पराकाष्ठा दिखती है,

‘अमावस-पूर्णमासी’ का यशोगान ‘दर्शपूर्णमास’ के रूप में वेदों से चला और…….पुराणों में यही ‘सूर्य-चंद्र’ की गति ‘श्रीराम-प्रह्लाद’ के चरित्र के बखान की प्रतीकात्मकता बन….. संपूर्ण ब्रह्मांड को विनाश और अराजकता से बचाते हुए, गुढ़ अर्थ को समेटे हुए, परस्पर खुशी का निर्देश देते हुए, विश्वपटल पर ‘भारतीय-संस्कृति’ का परचम लहरा रहे हैं।

तो क्यों ना हम….स्वयं को प्रकृति की गोद में बैठा हुआ जाने?
तो क्यों ना हम….रंग-बिरंगी प्राकृतिक ऊर्जा से ओजस्वी बने?
तो क्यों ना हम….दुखों की कालिमा को सुखों के प्रकाश से जगमगा दें?
तो क्यों ना हम….हमसफर, हमराज़, हमराही बन सृष्टि के बहुरंगों में समा जाएं?

– डा. अपर्णा धीरअसिस्टेन्ट प्रोफेसर, इन्स्टिटयूट आफ ऎड्वान्स्ट साइन्सीस, डार्टमोथ, यू.एस.ए.

रंग-बिरंगी प्रकृति की चमक

डा. अपर्णा धीर खण्डेलवाल

आया होली का त्योहार……लाया रंगों की फुहार

रंग भी ऐसे………जिसने खिलखिला दिया प्रकृति को

गुलाल तो केवल…..प्रतीक है उन रंगों का,

जिन से……चमक उठी है संपूर्ण धरा

शीत लहर के…..छटते ही

पीली-सुनहरी बन जाती है…..वसुंधरा

अब बादलों में…..छिपा सा नहीं

खुलकर लालिमा…..बिखेरता है सूरज

पाले से…..झुलसे हुए पत्ते

नवीन कोपलो के साथ….अब मुस्कुराने से लगते हैं

पौधों में आई….एक-एक कोपल

जब जरा-सी….अनावृत होती है

उसके रंग की….झलक

उस पौधे को….तिलक करती हुई सी

मानो आने वाली…रंगों-की-बहार के स्वागत की तैयारी करती है…..

जिधर देखो…. रंग ही रंग

लाल, पीला, नीला, बैंगनी, संत्री, गुलाबी, सफेद….

कहीं-कहीं तो सतरंगी, दो रंगी….फूलों के रंग अनेक

ऐसा कौन-सा रंग नहीं….जो इस मौसम में फूलों में ना दिखे…

घर हो या पार्क…..सड़क हो या इमारत

रंग-बिरंगी इक लहर सी…..दिख रही है सब ओर सी

एक नहीं…दो नहीं

दस-दस फूलों के…. ये प्राकृतिक गुच्छे

आभा समेटे….भेंट बनने को तैयार

बचपन से ही….सुना है मां को

यह कहते हुए…..कि वह फूलों को पढ़ाया करती थी…..

लगता है वही गुण

धीरे से….आ गया मुझ में भी

मैं भी….चुपके-चुपके

फूलों से…. बातें करने लगी

अब पौधे….अपना हाल

मुझे बताने लगे….और

उगते सूरज के साथ….आए हुए नए फूल….

मुझसे इतराने लगे…..

रंगों की छटा….बिखेरते हुए

ये फूल….’हम, में से, कौन ज्यादा रंगीन है’?

ऐसा मुझसे पूछने लगे…..

जिन फूलों को……मैं थोड़ा ज्यादा निहार लेती

वह सीधा मुझे…….उनकी फोटो खींचने के लिए इशारा कर देते

फोटो खिचते ही…..वे फूल,

अपने को ‘Star’ समझने लगते….

और ‘Social-Sites’ पर जाने के लिए…..

 शोर मचाने लगते

अगर मैं गलती से ना कर देती….किसी फूल को

तो गुस्से से मुंह फुलाकर….झटपट कह देते

“अगली बार घूमने जाएगी, तो तेरे पीछे background नहीं बनाएंगे”

प्राकृतिक रंगों की….यही मोह-माया

ना मुझे…..उन्हें आंखों से ओझल करने देती है…..

और ना ही…..   उनसे दूर होने देती है

भगवान की भी…..लीला निराली

जो  वसन्त को ’ऋतुराज’

और प्रकृति के….

इन रंगों से बनाया हमारे जीवन को…..   जीवन्त

धरती मां का….रंग-बिरंगा

यह रूप ही……होलिकोत्सव के आगमन को…..

दर्शाता है

और…..

सभी प्राणियों के मन को…..उल्लास से भरता है

यही रंग-बिरंगें फूल…. होली-पर्व में….

गुलाल के रूप में…..हमारे हाथों में नजर आते हैं

और हम सबके चेहरे को रंग-बिरंगा बनाते हैं…….

आइए! हम सब भी……बिना किसी मनमुटाव के,

बिना किसी भेदभाव के……प्रकृति के समान

खुद को रंग-बिरंगा बना ले

और एक रंग हो जाए!

– डा. अपर्णा धीर खण्डेलवालअसिस्टेन्ट प्रोफेसर, इन्स्टिटयूट आफ ऎड्वान्स्ट साइन्सीस, डार्टमोथ, यू.एस.ए.

यादें होली की

डा. श्रुचि सिंह

होली का पर्व लाया कुछ यादों का पिटारा,

स्कूल से लौटते किसी ने था रंग डाला।

मच गया था खूब रोना- धोना,

कुछ न किया फिर भी मुझको क्यों रंग दिया।

बालमन को रंगों के त्योहार का कुछ भी न था पता,

बस लगा कि हो गया कुछ बुरा।

कुछ बड़े हुये तो गये होलिका दहन में,

‘होलिका मैया की जय’ के थे जयकारे सुने।

निबन्ध में तो मैम ने होलिका को बुरा बतलाया था,

तो होलिका “मैया” कैसे हुई कुछ समझ न आया था।

पापा की मुस्कान इस प्रश्न पर याद आती है,

यह कथा प्रेम और समर्पण भी सिखलाती है।

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भाई ने प्रेमी को सज़ा और ब्याह न होने देने की दी धमकी थी,

भतीजे को मार वरदान से, पति पा लेने की शर्त रखी थी।

होलिका ‘मैया’ है क्योंकि अपने दुशाले से उसने प्रह्लाद को बचाया था,

जिस अग्नि के लिये अस्पृश्य थी उससे मरना स्वीकारा था।

प्रेम की पराकाष्ठा भी कुछ कम न थी,

इलोजी ने उसकी याद में उम्र बिता दी थी।

स्कूल से लौटते ही भाग कर छत पर माँ के पास जाना, पापड़ बनवाना, और चिप्स फैलाना।

गुझिया, सेव, खुर्मों का लालच भी निराला है,

भिन्न-भिन्न रंगो का आकर्षण भी मन मोहने वाला है।

भाग-भाग कर रंग लगाना और खुद को बचाना,

कभी सूखे, तो कभी गीले रंगों से नहाना और नहलाना।

तेल-उबटन और खेल यह भी अहम हिस्सा है,

बिन हँसी-मजाक के त्योहार कहाँ पूरे होने हैं।

कन्या और बड़ों के पैर छुए जाते हैं,

फिर आशीष भी दिये – लिये जाते हैं।

गन्ना खाना भी आसान बात नहीं,

किसने कितना, और कितना जल्दी खाया यह रेस भी है लगनी।

होली है पिरोती हर बार एक नई बात,

पहली होली ब्याहता की नहीं होती सास के साथ।

यूट्यूब ने सुलझायी इस बार यह गुत्थी,

होलिका को जलता देख उसकी सास थी सदमे से मरी ।

अहंकार, बल झूठा, था तब जला प्रेम-भक्ति की आग में,

और आज महाकाल भी भभक उठे केमिकल युक्त गुलाल से।

भगवान भी कह रहे प्राकृतिक रंगों से रंगो मुझको,

यह केमिकल बेटा तुम अपने लिये ही रखो।

मिठाई व्यञ्जन भी यदि देना तो शुद्ध ही देना,

यह मिलावटी मुझको नहीं है लेना।

चलो इंद्र‌धनुष एक बार फिर बनाते हैं,

शुद्ध प्राकृतिक रंगो से जीवन निखारते हैं।

रंगना और रंग जाना कुछ आसान नहीं,

है कृष्ण का राधा से मिलन कुछ आम बात नहीं।

इस बार अयोध्यापुरी भी थी इठलाई,

अपने ही घर में रंगे गये थे जो रघुराई।

आज सब को Happy Holi – Happy Holi,

प्रकृति के साथ-साथ, हमने भी खेल ली।

Dr. Shruchi Singh, Research Associate, Kuruom School of Advanced Sciences [An associate institute of ‘Institute of Advanced Sciences’ (INADS)].

धनतेरस की लक्ष्मी

सुश्री अनुजा सिन्हा

हर वर्ष जब दीपावली आने वाली होती है तो मुझे एक अलग-सा एहसास होता है, एक सुखद अनुभूति होती है। पर्व-त्योहारों की चल रही शृंखला में रोशनी के त्योहार दीपावली की अपनी ही एक सुंदरता है। मुझे जो अनुभूति होती है, उसका एक कारण यह भी है कि मेरा जन्म धनतेरस के दिन हुआ था। प्रत्येक वर्ष मेरा जन्मदिन दीवाली के आस-पास पड़ता है। मेरा जन्म नॉर्मल डिलीवरी से हुआ था इसीलिए माँ मुझे अगले ही दिन घर ले आयीं। मुझसे डेढ़ वर्ष बड़ा भाई घर पर था। दीवाली के पटाखों के शोर में नवजात शिशुओं को परेशानी हो सकती है। वह सहम सकते हैं, शोर के कारण उनके कानों में समस्या हो सकती है, यहाँ तक कि जान का भी खतरा हो सकता है। इन्हीं  कारणों से माँ को डर था कि मुझे कुछ हो न जाये। उन्होंने मुझे बड़ी हिफाज़त से कमरे के अंदर रखा और भरसक कोशिश की कि मुझे आतिशबाज़ी के शोर से परेशानी न हो।

सुश्री अनुजा अपनी माँ के साथ

घर में धनतेरस के दिन बेटी का जन्म होना शुभ माना गया। सबने कहा कि लक्ष्मी घर आई हैं। बचपन से ही धनतेरस के दिन माँ कहा करती थी कि आज के दिन ही तुम्हारा जन्म हुआ है। मुझे एक अजीब सी खुशी होती थी। जब मैं बड़ी हुई, तो मालूम हुआ कि धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा होती है। वह आयुर्वेद के देवता हैं। बाद में पता चला कि वह भगवान विष्णु के अवतार हैं, जो समुद्र-मंथन के समय प्रकट हुये थे। जिस दिन उनका प्रादुर्भाव हुआ, उस दिन को धनतेरस के रूप में मनाया जाता है।

मेरे मन में यह प्रश्न हमेशा उठता था कि जब धनतेरस पर आयुर्वेद के देवता की पूजा होती है तो यहाँ धन की बात कहाँ से आई ? धनतेरस को लोग धन से क्यों जोड़ते हैं? धन का अर्थ मात्र स्वर्ण या रुपये-पैसे नहीं होता, बल्कि धन का एक अर्थ है जोड़ना। धन अर्थात बढ़ोत्तरी होना। आयुर्वेद के माध्यम से स्वास्थ्य में बढ़ोत्तरी होने को धनतेरस कहते हैं। एक और बात यह है कि वह कहते हैं न धन-धान्य की वृष्टि होती है। यहाँ ‘धान्य’ यानि धान, अर्थात अन्न है। अर्थात अनाज को धन के समान महत्वपूर्ण माना गया है। यहाँ पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि दीपावली के अवसर पर आयुर्वेद के भगवान की उपासना इस कारण से की जाती है कि स्वास्थ्य-धन अन्य भौतिक धन की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।

बहरहाल, भारतीय संस्कृति में कन्या को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है, इसीलिए इस दिन मेरे जन्म को लक्ष्मी से जोड़ना अनुचित नहीं जान पड़ता। परंतु यदि धनतेरस के दिन किसी बालक का जन्म होता है तो यह अवश्य कहना चाहिए कि भगवान धन्वंतरि का आगमन हुआ है! इससे शायद उसके अंदर भी उनके भाव जग जाएँ।  

सुश्री अनुजा सिन्हा, निदेशक, टीसीएन मीडिया

2023 का रक्षाबन्धन-त्यौहार : राखी आज बाँधे या कल…..?

डा. अपर्णा धीर खण्डेलवाल

(डा. अपर्णा अपने भाई और भतीजे को राखी बाँधते हुए)

श्रावण मास की पूर्णिमा रक्षाबन्धन के त्यौहार के नाम से जानी जाती है। इस दिन को इस तिथि को ध्यान में रखकर वर्षों से मनाया जाता आ रहा है, परन्तु 2023 में एक नया शब्द सुनने में आया ‘भद्रा’। यूं तो यह भद्रा-काल ज्योतिषीय काल विशेषज्ञों के द्वारा विचार करने योग्य है, पर आम लोगों के लिए यह सोच का विषय बन गया, क्योंकि 30 अगस्त, 2023 को सूर्य उदय के बाद प्रात: 10.45 पर पूर्णिमा तिथि शुरु हो गई, लगभग उसी समय प्रात: 11.00 बजे भद्रा भी लग गई। सुबह 11.00 बजे से रात 9:00 बजे तक भद्रा का समय है। ऐसी मानयता है कि भद्रा-काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता (नेमीचंद्र शास्त्री, भारतीय ज्योतिष, पृष्ठ. 124)। भद्रा के पश्चात् ही शुभ मुहूर्त रक्षाबन्धन के लिए कहा गया है, जो 30 अगस्त, 2023 रात 9:30 बजे से लेकर 31 अगस्त, 2023 सुबह 7:00 बजे तक माना गया है|

अब प्रश्न यह है कि यदि यही समय रक्षाबन्धन का त्यौहार मनाने का उत्तम समय है, तो क्या भारत में लोग रात को अपने घर से राखी का पर्व मनाने निकलेंगे और अगले दिन सुबह 7:00 बजे तक ही मनाएंगे? इसी उधेड़-बुन में सभी लोग एक दूसरे को फोन करने लगे, एक दूसरे से बात करने लगे, यह एक चर्चा का विषय बन गया कि राखी इस साल कब बाँधे 30 अगस्त को या 31 अगस्त को? फिर सब ने सोचा कि ऐसा करते हैं कि जिस दिन स्कूल के बच्चों की छुट्टी होगी, समझ लेंगे उस दिन ही राखी है। तभी स्कूल से भी चिट्ठी (notice) आ गई कि 30 अगस्त को स्कूल बंद रहेंगे…रक्षाबन्धन के पर्व के उपलक्ष में। फिर भी मन को यह बात समझ ना आई कि हम तो मन में 31 अगस्त फाइनल करके घूम रहे थे…यह 30 अगस्त कहाँ से आ गया। अब रात को कैसे राखी मनाऐ, भले ही छुट्टी स्कूल वालों ने 30 अगस्त को दे दी है?

फिर और चर्चा की गई, आपस में फोन किये गये, संदेश भेजे गये, सोशल मीडिया पर डाला गया, गूगल से पूछा गया। सब ने अपने-अपने तरह से इस बात का जवाब देना शुरू कर दिया। किसी ने कहा हम 30 अगस्त को मनाएंगे, किसी ने कहा हम 31 अगस्त को मनाएंगे। पहली बार ऐसा हुआ कि इस विषय पर चर्चा अखबार वालों ने भी की। अपनी एक रिपोर्ट के ज़रिए, जिसमें उन्होंने दिल्ली के बड़े-बड़े मंदिरों के पुजारियों से इस बात को रखा तो उन्होंने कहा कि “राखी का पर्व ऐसा है जिसमें कोई खास विधि-विधान से पूजा नहीं कही गई है, तो इसीलिए दोनों दिन ही शुभ हैं….आप दोनों दिन कर सकते हैं लेकिन हम तो अपने देवी-देवताओं को 30 अगस्त को ही राखी बाँध देंगे”।

यह पढ़कर फिर मन में आया कि क्या राखी 30 अगस्त को करें कि 31 अगस्त को करें? पर फिर सबने अपने-अपने तरह से राखी बाँधने के समय को लेकर विचार-विमर्श प्रारम्भ कर दिया, और अपने विचार के अनुसार तिथि को स्पष्ट करने लगे। मेरी माता जी ने अपने किसी जानने वाले से पूछा कि “आप पंजाब में राखी कब मना रहे हैं?”, तो उन्होंने कहा कि “हम तो 29 अगस्त को शाम को ही मना रहे हैं”। अब यह बड़ी विचित्र बात थी कि 30 और 31 के झमेले में यह 29 कहाँ से आ गया? हालकि बाद में मुझे मालूम पड़ा कि वो अपने राखी पर आधारित किसी ओनलाइन कार्यक्रम की बात कर रहे थे। इसी बीच मेरे घर में काम करने वाली आया बोली कि “ऐसा है दीदी मैं हो सकता है 30 अगस्त की छुट्टी करूं हो सकता है 31 अगस्त की छुट्टी करूं पर समझ नहीं आ रहा किस दिन राखी बाँधेगें?” फिर 30 अगस्त को अचानक से वह आ खड़ी हुई तो मैंने पूछा “तुमने तो छुट्टी करनी थी कैसे आ गई राखी कब बाँधोगी?” तो कहने लगी “हम तो 31 अगस्त को ही रक्षाबन्धन मनाएगें क्योंकि किसी ने बताया है 30 अगस्त को सूर्य ग्रहण है”।

राखी का पर्व ऐसा होता है कि भाई, बहन के घर जाये या बहन, भाई के। वास्ताव में सब को एक दूसरे के घर जाना होता है, और आगे से आगे जाना होता है तो क्या ऐसी दशा में इस तरह से दो-दो दिन यदि त्यौहार होने लगे तो क्या समाज की व्यवस्था अस्त-व्यस्त नहीं हो जाएगी? पर मुझे यह नहीं समझ आता ऐसी उलझन राखी-पर्व को लेकर ही क्यों सामने आई? क्या कभी ऐसा सुना है कि दशहरे का समय आज बदल गया है, रावण शाम की जगह सुबह जलाया जाएगा, दिवाली के दिन लक्ष्मी पूजन का शुभ समय अधिकतर शाम को ही होता है तो क्या कभी कहा गया है कि सुबह के समय आज लक्ष्मी पूजन कर लो, क्या कभी ऐसा हुआ है की होली पर कहा जाए कि आज होली खेलने का समय शाम का है तो लोग सुबह की बजाये शाम को होली खेल रहे हैं, क्या कभी ऐसा हुआ है कि कार्तिक मास में आने वाला चौथ का त्यौहार जो कि करवाचौथ के नाम से मनाया जाता है, क्या ऐसा कहा जाता है कि दोनों दिन उपवास रख लो चाँद की चतुर्थी तिथि दोनों दिन ही नज़र आएगी?  

यह तो कुछ भी नहीं जब राखी के विषय में मैं अपने कार्यालय में चर्चा करने लगी तो वहाँ विचार-विमर्श हो रहा था कि राखी का त्यौहार भाई-बहन के नाम से तो बाद में प्रसिद्ध हुआ है, पहले तो पत्नियाँ ही अपने पति को युद्धस्थल में भेजने से पहले उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा करती थी। इस विषय को सुदृढ़ करने के लिए इन्द्र और शची का उदाहरण भी मेरे ही सहकर्मी ने दिया।

अब ऐसी चर्चा जब सामने आती है, तो क्या राखी का पर्व इसी सोच-विचार में डूबे हुए मनाऐ…इस साल? मैं समझती हूं की रक्षा-सूत्र बाँधकर केवल ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कि ’हमारे समस्त परिजनों की रक्षा स्वयं ईश्वर करे’, ऐसी ही मंगल कामना मैं प्रतिदिन करती हूँ। अब चाहे श्रावण पूर्णिमा का दिन हो चाहे साल का प्रत्येक दिन, ओम्।

Raksha Bandhan 2018: how to tie rakhi know about procedure - रक्षा बंधन  2018: बहनें इस विधि से बांधें अपनी भाई की कलाई पर राखी , पंचांग-पुराण न्यूज
(Source of image : https://www.livehindustan.com/astrology/story-raksha-bandhan-2018-how-to-tie-rakhi-know-about-procedure-2138653.html)

– डा. अपर्णा धीर खण्डेलवालअसिस्टेन्ट प्रोफेसर, इन्स्टिटयूट आफ ऎड्वान्स्ट साइन्सीस, डार्टमोथ, यू.एस.ए.

आईए, समाज को समाज से जोड़ें!

डा. अपर्णा धीर खण्डेलवाल

कभी-कभी जिंदगी के छोटे-छोटे किस्से भी बहुत बड़ी सीख दे जाते हैं और हम कभी उन्हें वैसे महसूस नहीं करते। लेकिन जब सामने हो रहे होते हैं, तब किसी याद के रूप में वह अक्सर हमें भीड़ में भी अकेला कर देते हैं यानी वह हमें उस पल में पिछली जिंदगी के कुछ लमहों की याद दिला जाते हैं।

ऐसा ही एक किस्सा अभी कुछ ही दिन पहले मेरे साथ हुआ। मैं किसी कारणवश अपनी माताजी को लेकर बैंक गई, वहाँ मैंने देखा लंबी कतार थी पासबुक की entry कराने के लिए लेकिन, सामने जो बैंक-employee था वह पहले तो अपनी सीट पर नहीं था, फिर जब आया तब उसने कहा कि ‘इतना वक्त नहीं है हमारे पास कि हम सबकी पासबुक में एंट्रीयाँ करते रहे, आपके लिए मशीन लगा रखी है जाईए अपनी पासबुक उसमें से पूरी करा लीजिए’। तब जो लोग तो उस कतार में पढ़े-लिखे थे, वह तो भागकर अपनी पासबुक को ऑनलाइन मशीन से पूरा कराने लगे परन्तु जो लोग बेचारे कुछ गरीब वर्ग के थे, या ज्यादा शिक्षित नहीं थे, उन्होंने बार-बार उस व्यक्ति से आग्रह किया कि ‘भाईसाहब हमें मशीन नहीं चलानी आती, हम पढ़े-लिखे नहीं हैं, हमें नहीं पता कि पासबुक में मशीन से एंट्री कैसे होगी, कृपया आप ही कर दीजिए’। तो वह बैंक-employee बोला कि अगर ‘मैं इस तरह से सबकी एंट्रियाँ करने लगूंगा, तो कोई और काम नहीं है क्या हमारे पास करने के लिए’। उसका यह जवाब थोड़ा कड़क भी था और थोड़ा संवेदनशीलता से दूर भी था। मैं पीछे खड़ी कतार में देख रही थी, मैंने आगे बढ़कर उन आशिक्षित लोगों की पासबुक में एंट्री करवाई।

India To Reduce Number Of State-Owned Banks From 12 To 5: Report
(Source of Image: https://www.ndtv.com/business/bank-privatisation-government-looking-to-privatise-more-than-half-of-state-owned-banks-report-2265907)

समय बहुमूल्य है, पर पता नहीं क्यों ऐसा मन में आया कि यदि मैं इनकी मदद नहीं करूंगी तो यह आज भी निराशा से ही घर लौटेंगे, क्या पता किसके घर में कैसी ज़रूरत है कि उसे पासबुक की एंट्री देखकर ही अपने खाते का ज्ञान होता हो। तब उस दौरान एकदम से मुझे मेरे स्वर्गीय पिताजी के शब्द ध्यान में आए जो जब भी सरकारी बैंकों में जाते, अक्सर यही बात कहते कि ‘यह मुझे पता नहीं चलता की सरकार ने सरकारी employees जनता की मदद के लिए रखें है या कि जनता को तंग करने के लिए?’ यह उक्ति वो अक्सर कहा करते थे। तब हम इतने छोटे थे कि उनकी बात को या तो हंसी में टाल देते थे या हमेशा यह सोचते थे कि पापा आप क्यों सरकारी लोगों से पंगे लेते हो। पर आज जब हम सूझबूझ रखने लगे हैं, तब ऐसा लगता है कि वास्तव में जीवन ऐसा ही है जो ऊंचे पदों पर हैं वें अक्सर ऐसा ही बर्ताव करते हुए नज़र आते हैं जबकि उन्हें सदा समाज के प्रत्येक नागरिक के प्रति संवेदना रखते हुए सरकारी कार्यवाही को करना चाहिए। [क्योंकि] केवल खानापूर्ति [कर्त्तव्य पूरा] करना ही किसी पद की गरिमा नहीं होती, उसमें संवेदना का भी उतना ही गहरा रिश्ता होता है और यही रिश्ता समाज को समाज से जोड़ता है।

(Source of Image: Dr. Aparna with her Father during 90’s)

– डा. अपर्णा धीर खण्डेलवाल, असिस्टेन्ट प्रोफेसर, इन्स्टिटयूट आफ ऎड्वान्स्ट साइन्सीस, डार्टमोथ, यू.एस.ए.

गांव का स्नेह-सत्कार

-डॉ. आशा लता पाण्डेय

गाँव, गांव की माटी और माटी की सोंधी गंध….सब मेरी आंखों में, सांसों में रची-बसी है। गांव से बचपन की बहुत सी यादें जुड़ी हैं। बचपन में बहुत बार गांव में आना-जाना होता था। चाचा-चाची, काका-काकी, दादा-दादी वहां रहते थे। शहर से गांव पहुंचने पर बड़ा ही स्नेहमय स्वागत होता था। तब यातायात के इतने साधन नहीं थे तो कभी बैलगाड़ी में, कभी मियांना (पालकी) में चढ़कर जाते थे। करीब आधा घंटा लगता था सड़क से गांव तक पहुंचने में।

जैसे ही हम लोग पहुंचते  थे, पीतल की चमचमाती परात में ठंडे -ठंडे पानी में पैर धोया जाता था। इतना आनंद आता था कि सारी थकान उतर जाती थी और फिर नाउन, काकी बोलते थे हम उनको, वह आकर हम लोगों का पैर दबाती थीं। ठंडे-ठंडे पानी में पूरी थकान उतार के हम सभी तरोताजा हो जाते थे।

खाने के समय हम सभी भाई-बहन चाचा के बच्चे और हम लोग जब खाने बैठते थे तो हमारी काकी हम लोगों की थाली में अपने बच्चों की थाली से ज्यादा घी डालती थीं। यह बात हमें आज तक याद है। हम लोगों के आने की खबर मिलते ही गाँव के सभी लोग मिलने आते थे परोसी दादा (पड़ोस वाले दादा), पडा़इन काकी (पाण्डे काका की धर्म-पत्नी), बरा काका (इस नाम की भी बड़ी रोचक कहानी है कि जब थोड़ा हकलाने वाले शिवपूजन ने अपनी शादी में खाने पर दुबारा से बड़े माँगे तब से पूरा गांव उन्हें ‘बरा’ के नाम से ही जानता है और उनकी पत्नी बन गई बराइन काकी -इन प्रत्यय लगाकर डाक्टराइन, वकीलाइन, मास्टराइन आदि सम्बोधन सुविधानुसार बना लिये जाते थे) और भी इसी तरह के बहुत से लोग जो सम्बन्धी न होते हुए भी सम्बन्धियों जैसे सम्बोधन से बुलाये जाते थे।

ऐसा प्यार आज की दुनिया में कहां? आज तो ये हो गया है कि मैं, मेरा पति और मेरे बच्चे….यहीं तक दुनिया सीमित होकर रह गई है। गांव का जुड़ाव और गांव का स्नेहभरा वातावरण कहीं भी नहीं देखने को नहीं मिलता। आज के तनाव वाले इस युग में यदि हम गाँवों से इस तरह का प्यार, आदर सीख-सिखा सकें तो बहुत सी समस्याऐं हल हो सकती हैं।

तो यह रही मेरी कुछ यादें मेरे गांव की और भी बहुत-सी मीठी यादें हैं…जो हम आपसे समय-समय पर साझा करते रहेंगे तब तक के लिए आप सबको मेरी राम राम।

डॉ. आशा लता पाण्डेय, संस्कृत-शिक्षिका (अवकाश प्राप्त), दिल्ली पब्लिक स्कूल, दिल्ली

शहर की सड़कों से गांव के गलियारों तक

डा. अपर्णा धीर खण्डेलवाल

अक्सर शहरवासियों का मानना है की गांव में रखा क्या है? और ऐसा होता भी है जब हम शहर की चकाचौंध और अपने शहरी लिबास में रहते हैं तो हम गांव की उन छोटी-छोटी बातों को अनदेखा कर देते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ जब मैं आज से लगभग 4 वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले में बसे ’कुरूऊँ गाँव’ गई।

वहां जाकर मैं समझ पाई कि वास्तव में प्राकृतिक रूप में मिला हमें यह जीवन अत्यंत सरल है परंतु हम शहरवासियों ने उसे कॉम्प्लिकेटिड बना दिया है। क्यों नहीं हम सहजता से जीवन जी पाते? क्यों नहीं हम जो खाते हैं उसे सरलता से ग्रहण कर पाते? ऐसे ही कुछ बातों को जब मैंने गांव में कुछ दिन रहते हुए करीब से जाना तो समझ आया कि ग्रामीण शैली ही वास्तव में बहुत सहज और साधारण है।

सौभाग्यवश मुझे तीन-चार दिन ’कुरूऊँ गाँव’ में रुकने का अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ मेरे ही कार्यालय के निदेशक का ग्रामीण गृह है। यह गांव की मेरी सर्वप्रथम विज़िट थी।

उस अवसर के दौरान मुझे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि मैं उनके परिवार का हिस्सा नहीं हूं क्योंकि बच्चे मुझे ‘बुआ’ बुलाने लगे और बड़े मुझे ‘बेटी’। यूं तो हम शहर में भी अपने घर आए मेहमान को सम्मान देते हैं परंतु उन्हें पारिवारिक हिस्से के रूप में समझ कर बातचीत करना यह शहर में कम देखने को मिलता है। वहां रहते हुए परिवार के बच्चों के साथ में इतना घुल मिल गई कि उन तीन-चार दिनों में बच्चे मुझे एक दिन अपने खेत दिखाने ले गए| जैसे ही हमने घर से बाहर कदम रखा, वहां से ही उनका खेत शुरू हो गया और मैं आराम से जैसे हम शहर में गर्दन ऊंची करके चलते हैं…उसी तरह चलने लगी। तभी मेरे साथ चल रहे 3 साल के बच्चे जोकि मेरे निदेशक के ही भाई का पोता है, उस तेज बल सिंह ने एकदम से मेरा कुर्ता खींचा और मुझे झुककर देखने को कहा ” बुआ! आप आराम से चलिए, यहां हमने मटर बॉय हुई है”। मैं देखकर दंग रह गई कि अभी तो भूमि से अंकुर भी बाहर नहीं आए हैं…भला इस 3 साल के बच्चे को इतना ज्ञान कैसे? क्या यह घर में हो रही बातों को सुनता है? क्या यह खेत में जाकर काम करता है? यह कैसे जान पाया कि जिस स्तह पर मुझे केवल मिट्टी दिखी वहाँ  मटर उगने वाली हैं।

और इस तरह कुछ दूर तक गांव के उन खेतों को घुमाते हुए और उगाए हुए अन्न के विषय में जानकारी देते हुए छोटे-छोटे कदमों से चलते हुए….. घर के बच्चे मुझे गांव के सरल जीवन का ज्ञान दे गए।

डा. अपर्णा धीर खण्डेलवाल, असिस्टेन्ट प्रोफेसर, इन्स्टिटयूट आफ ऎड्वान्स्ट साइन्सीस, डार्टमोथ, यू.एस.ए.

गाँव : देश की धड़कन

Alok Kumar Dwivedi

भारत गाँवों का देश माना जाता है। महात्मा गांधी के इस भाव को उनके वैचारिक अनुयायी आज भी स्वीकार करते हैं। उनके वैचारिकी में भारत का गाँव सुविधाविहीन, अशिक्षित, असंस्कारित एवं दिशाहीन होकर सुशिक्षित, संस्कारयुक्त, संपोष्यभाव को अपनाए हुए तथा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के सक्षम रूप में उपस्थित होता है। सामान्यतः ऐसा माना जाता है की वर्तमान तकनीकी एवं वैज्ञानिक युग में ग्रामीण व्यवस्था अप्रासंगिक हो गई है। परंतु यह अर्धसत्य है। आज भी ग्रामीण जीवन शैली उत्तम जीवन दशा का द्योतक है। गाँव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता वहाँ का आपसी साहचर्यभाव रहा है। साथ मिलकर एक दूसरे के सुख-दुख के भागीदार के रूप में आगे बढ़ने की प्रवृत्ति गाँवों को शहरों से पृथक करती है। शहरी व्यवस्था स्वकेंद्रित होती है जहाँ पर रह रहे लोगों के अपने-अपने सामाजिक स्तर होते हैं। जबकि गाँव में आपको समाजवाद का अनोखा रूप सामने मिलता है जो कि पारिवारिक समाजवाद है। इसके अंतर्गत गाँव के समस्त लोग एक दूसरे को अपने परिवार के रूप में स्वीकार करते हैं। यह सिर्फ स्वीकार करने तक सीमित नहीं वरन उनके आपसी पारिवारिक संबोधन भी होते हैं। जैसे- गाँव में रह रहे लोगों का आपसी संबोधन नाम लेकर नहीं बल्कि चाचा, ताऊ, भाई, बहन, चाची, दादी, बाबा इत्यादि रूप में होता है। यह व्यवस्था जाति के सामाजिक ताने-बाने से ऊपर उठी होती है जहाँ एक ब्राह्मण का लड़का वैश्य या शूद्र के बुजुर्ग को चाचा या बाबा कह कर ही पुकारता है। परंतु शहरी व्यवस्था के प्रभाव से वर्तमान में यह भाव कमजोर होता जा रहा है जिसकी बानगी यह कहानी कहती है।

श्याम जिसकी उम्र अभी 12 या 13 वर्ष है, अधिकांशतः वह अपने बगल में रामलाल (जोकि जाति के आधार पर नाई जाति के हैं) के घर पर ही उनके बच्चों के साथ खेलने में बिताता रहा है। श्याम के पिता पंडित श्रीनिवास गाँव में पुरोहित कर्म के साथ-साथ लोगों को सदाचार की भी शिक्षा दिया करते थे। समय बीतने के साथ-साथ जब श्याम की उम्र 18-19 वर्ष की हुई तो उसे विद्या अध्ययन के लिए शहर में भेजा गया। शहर में चार-पांच वर्ष व्यतीत करने के पश्चात् जब वह अपने गाँव वापस आया तो अब उसे रामलाल के घर जाने तथा उनके बच्चों के साथ बैठकर भोजन करने में थोड़ी सी हिचक महसूस होने लगी। उसे रामलाल को काका कहने में भी हिचक लगती थी क्योंकि गाँव के ग्रामीण लोगों के हाव-भाव उसके शहरी मनोदशा से बिल्कुल उलट दिखाई पड़ते थे। शहरी आबोहवा ने श्याम को अपनी पहचान के लिए यद्यपि सचेत तथा दृढ़ कर दिया था परंतु वह पारिवारिक एवं सामाजिक समाजवाद के अपने ग्रामीण परिवेश से काफी दूर हो चुका था। आज के ग्रामीण एवं शहरी व्यवस्था में यह एक प्रमुख अंतर पाया जाता है किस शहरी परिवेश का व्यक्ति अपनी पहचान को स्वयं तक सीमित कर लेता है जबकि ग्रामीण परिवेश में लोग अपनी पहचान एवं अस्तित्व को अन्य लोगों से जोड़कर देखना पसंद करते हैं।

वर्तमान कोरोना कालखंड में बहुत अधिक मात्रा में लोग शहर से गाँव की तरफ पलायन कर आए। उन सबके समक्ष रोजगार का गहरा संकट आया हुआ है। गाँव की एक विशेषता यह भी रही है कि यहाँ पर जल्दी भूखे न तो कोई सोता है तथा नहीं भूख से किसी की मृत्यु होने दी जाती है। आपसी सहयोग की भावना से लोग एक दूसरे की मदद कर देते हैं। कोरोना के इस दौर में सरकार ने भी लोगों के जीवन को आगे बढ़ाने के लिए भरसक प्रयास किया है। पर अब समय है कि भारत के गाँव को आर्थिक दृष्टि से भी समृद्ध किया जाए जिससे कि लोगों का शहरों की तरफ पलायन कम हो सके। इसके लिए गाँव के लोगों को उनके कौशल से साक्षात्कार कराया जाना आवश्यक है। जिसके अंतर्गत गाँव में ही ऐसे संसाधन उपलब्ध कराने होंगे कि गाँव में उत्पादित वस्तुओं को बाजार मिल सके।

हाटनाव इस दिशा में एक बहुउपयोगी प्रयास है। हाटनाव के अंतर्गत हम सब का प्रयास है कि ग्रामीण लोगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर ही बाजार उपलब्ध हो सके। इससे ग्रामीण स्तर की क्षमताओं को प्रकाश में लाने में सहायता होगी तथा वही स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार एवं उपलब्ध बाजार के माध्यम से लोग आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की ओर अग्रसर होंगे। इस प्रकार वर्तमान तकनीकी युग में हाटनाव, “तकनीक से ग्रामीण आत्मनिर्भरता” अमेरिका के प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक एवं चिंतक प्रोफेसर बलराम सिंह का अनोखा प्रयास है। प्रोफेसर सिंह गांधीजी,  विनोबा भावे तथा नानाजी देशमुख के “ग्रामोदय से राष्ट्रोदय” के विचार से काफी प्रभावित हैं तथा उनका लक्ष्य है कि भारत का गाँव आपसी-सौहार्दय, सामंजस्य, प्रेमपूर्ण भावना के साथ रखते हुए आर्थिक आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों को प्राप्त कर सके। यही “ग्रामराज्य से रामराज्य” की सरकार होती संकल्पना है।

Alok Kumar Dwivedi (SRF), Research Scholar, Department of Philosophy      University of Allahabad, & TEAM INADS